माँ के नाम पत्र
रात के तीन बजे, जब दुनिया सो रही होती है, एक छात्र अपने डर, अकेलेपन और अपनी माँ की यादों से लड़ रहा है। यह पत्र उस संघर्ष की दास्तान है, जो घर से दूर बड़े शहरों के कोचिंग संस्थानों में दम तोड़ देता है। माँ की ममता और सिस्टम की निष्ठुरता के बीच के इस अंतर को बयां करती एक मार्मिक रचना।
माँ के नाम पत्र
रात के तीन बज गए हैं, माँ,मुझे नींद नहीं आ रही।
कल मॉक टेस्ट है—
इस सप्ताह तीसरा।
तुम्हें पता है,
मैं रोज़ाना
छह घंटे कोचिंग लेता हूँ,
और उसके बाद
बारह से चौदह घंटे
सेल्फ-स्टडी करता हूँ।
ज़्यादातर मॉक टेस्ट में
मैं टॉपर रहता हूँ—
फिर भी
अंदर एक डर
लगातार जागता रहता है।
पढ़ाई के अलावा, माँ,
मुझे तुम्हारी बहुत याद आती है।
तुम मुझसे बहुत दूर हो।
तीन महीने से
मैं तुमसे मिला नहीं हूँ।
सप्ताह में पाँच मिनट ही
मोबाइल पर
तुमसे बात करने की अनुमति मिलती है—
और उन पाँच मिनटों में भी
मैं देखता हूँ
तुम मेरी कितनी चिंता करती हो।
मुझे पता है,
तुम पिताजी को
मुझे भेजने से
रोक नहीं पाई होगी।
मन ही मन
कितना रोती होगी तुम।
माँ,
जब मैं घर पर था
तब भी
कितना अच्छा परफ़ॉर्म कर रहा था।
हाँ, यहाँ
टॉप क्लास अकैडमिक पढ़ाई होती है,
पर साधारण टॉपिक में भी
डर पैदा किया जाता है—
असफलता का डर।
तुम तो कभी
ऐसा नहीं करती हो, माँ।
हमेशा मेरा
हौसला बढ़ाती हो।
मैं फिजिक्स के
मुश्किल से मुश्किल
कॉन्सेप्ट समझने की क्षमता रखता हूँ,
फिर भी
ऐसा क्यों लगता है
कि पहले
मुझमें फेल होने का भय
डाल दिया जाता है?
मैं जीवन में
कुछ बनना चाहता हूँ—
पर
तुम्हारे पास भी रहना चाहता हूँ।
जो केयर तुम देती हो,
वह यहाँ का
हाइली प्रोफेशनल
कोचिंग स्टाफ नहीं दे पाता।
उनका व्यवहार
मैकेनिकल और फॉर्मल लगता है।
उन्हें यहाँ
खूब पैसा मिलता है—
तुम जानती हो
ये कितनी भारी फीस
चार्ज करते हैं।
दो दिन पहले
मुझे तेज़ बुखार हो गया था।
फटाफट
नर्स ने चेक किया,
दवाई दी—
ताकि अगला मॉक टेस्ट
मिस न हो।
माँ,
यहाँ सब
दिखावा-सा लगता है—
पढ़ाई भी,
केयर भी।
बस एक ही बात
सच लगती है:
मैक्सिमम सेलेक्शन।
मैं
तुम्हारे पास आना चाहता हूँ।
मैं जानता हूँ
तुम मुझे
कॉम्पिटिशन में
जीतते हुए देखना चाहती हो—
पर तुम्हारी इच्छा
और इस कोचिंग संस्थान की इच्छा में
ज़मीन-आसमान का फर्क है।
यह लिखते-लिखते
उसकी आँखों से
कुछ आँसू गिर पड़े…
अगले दिन
कमरे में
डेड बॉडी के साथ
यह पत्र प्राप्त हुआ,
माँ शब्द—
आँसुओं की बूँदें गिरने के कारण
अभी भी गीले थे।
(काश! उस रात कोई उसे यह कह पाता कि "बेटा, तुम्हारा होना तुम्हारी सफलता से कहीं ज़्यादा ज़रूरी है।")
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