सुनो, तुम एक नया स्वेटर ले लो
यह कविता एक साधारण परिवार के भीतर छिपे प्रेम, त्याग और जिम्मेदारियों की गहराई को व्यक्त करती है। इसमें एक पत्नी के अनकहे अहसास बेहद सादगी से उभरते हैं।
सुनो, तुम एक नया स्वेटर ले लो
सुनो, तुम एक नया स्वेटर ले लो।
पुराना अब तुम पर फबता नहीं,
रंग भी उड़ गया है—
कुछ ऊन के धागे चुपके से
बाहर आ गये हैं।
अब यह मत कहना—मकान की
किस्त चुकानी है;
जानती हूँ, बच्ची बड़ी हो रही है।
मेरी दवाइयों का महीने का
खर्च भी बहुत है,
पर मेरी चिन्ता छोड़ो—
मैं तो दिन भर घर में रहती
हूँ,
ठण्डे पानी में काम करती
हूँ,
चूल्हे पर पकाती हूँ।
और तुम—
तुम तो दिन भर भटकते रहते
हो,
कहीं तुम्हें सर्दी लग गई
होगी…
सुनो,
तुम एक नया स्वेटर ले लो।
मैंने भी तो नये कपड़े
पिछले महीने लिये थे,
और तुम्हारी लाडली
बिटिया—कल ही तो नये जूते लाई है।
अब बहाना मत बनाओ—
सर्दी तो दो–तीन महीने की
है।
यह मत कहना—मुझे सर्दी नहीं
लगती है।
मैं सब महसूस करती हूँ—
जब भरी सर्दी में तुम घर से
बाहर होते हो,
तुम कितना ठिठुरते हो,
फिर भी अपने काम में लगे
रहते हो।
अपनी लाडली बिटिया के सामने
क्यों अपने फटे स्वेटर को
छिपाते हो?
सुनो…
तुम एक नया स्वेटर ले लो।
सुनो—तुम एक नया स्वेटर ले
लो…
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