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गुड़िया का जनाज़ा

जब दुनिया बड़े-बड़े दावों और जंगों में उलझी होती है, तब एक मासूम कोना चुपचाप दम तोड़ रहा होता है। यह कविता उन नन्हें कंधों और सहमी हुई आँखों की आवाज़ है, जिनसे उनका बचपन, उनके रंग और उनकी मुस्कान वक़्त से पहले ही छीन ली गई। आइए, शब्दों के इस आईने में आज की दुनिया का असली चेहरा देखें।   गुड़िया का जनाज़ा मिट्टी की गलियों में, टूटी दीवारों के बीच, चार नन्हे कंधों पर एक ख़ामोश कहानी है। हँसी के लिबास में छुपा हुआ मातम, ये खेल नहीं — वक़्त की बेइमानी है। गुड़िया है या कोई अधूरा सपना, दुपट्टे में लपेटकर जिसे उठाया गया, न दुआ मिली, न कोई साया मिला, बस मासूमियत को यहाँ दफ़नाया गया। इन नन्ही हथेलियों पर कितना बोझ है, जो उम्र से पहले ही समझदार हो गईं, खिलौनों की दुनिया में जन्मी आँखें, खंडहरों की खामोश गवाह हो गईं। लोरी की जगह धमाकों की गूँज है, हर रात यहाँ दिलों को दहलाती है, जहाँ खिलखिलाहट भी सहमी-सहमी चले, वहाँ नींद भी रोते-रोते आती है। किससे पूछें ये मासूम सवाल — कि खेल में ये मातम क्यों शामिल है? किसने छीना इनसे रंगों का जहाँ, क्यों हर सपना यहाँ ज़ख्मी और घायल है? ये चार कदम जो साथ उठे...