अहंकार का साया (हिंदी लघुकथा)
क्या न्याय की कुर्सी पर बैठा हर व्यक्ति वास्तव में न्यायप्रिय होता है? या सत्ता का अहंकार इंसान को इतना खोखला कर देता है कि उसे अपनी एक छोटी सी मानवीय चूक भी किसी बड़े अपराध जैसी लगने लगती है?
अहंकार का साया
यह एक राजा की कहानी है, या यूँ कहें कि एक कड़वी सच्चाई। एक सुबह राजा सज-धजकर अपने दरबार के लिए महल की सीढ़ियाँ उतर रहा था। अचानक, वह दो-तीन सीढ़ियों से लड़खड़ाकर नीचे गिर पड़ा। वह सकपका गया। उसे तुरंत यह अहसास हुआ कि महल की किसी दासी ने उसे गिरते हुए देख लिया है। उसका अनुमान सही था; एक दासी घबराकर झरोखे के पीछे छिप गई थी। राजा के मन में डर समा गया कि दासी यह बात सबको बता देगी और उसके विरोधी इसे उसकी कमजोरी मानकर सत्ता पाने का अवसर खोजने लगेंगे।
उसके भीतर विचारों का बवंडर उठने लगा, "मैं अभी बूढ़ा नहीं हुआ हूँ। क्या राजा कभी बूढ़ा होता है? जब तक वह जीवित है, वही राजा है। क्या उसकी नज़र कमज़ोर हो गई है? नहीं, पिछले महीने ही तो मैंने हिरण का शिकार किया था। दरबार में भी तो मैं हर दरबारी के मन को भांप लेता हूँ। जब फसल पर अतिरिक्त कर लगाने का निर्णय लिया गया, तो सबने सहमति जताई थी, पर मैं तुरंत समझ गया था कि मरु प्रदेश का प्रतिनिधि भीतर से असहमत है। शारीरिक दुर्बलता की शिकायत तो कभी रानियों ने भी नहीं की!"
इन्हीं विचारों के बीच वह अचानक चिल्ला उठा, "महल की सभी दासियाँ हाज़िर हों!"
घबराई हुई दस दासियाँ वहाँ पहुँचीं। राजा ने झेंप और क्रोध के मिले-जुले स्वर में पूछा, "कुछ समय पहले झरोखे में कौन खड़ा था?" सभी दासियों ने उलझन में एक-दूसरे की ओर देखा। उस दासी को, जिसने राजा को गिरते देखा था, समझ नहीं आ रहा था कि क्या यह इतनी बड़ी बात है कि राजा इतना चिंतित हो जाए? उसके लिए तो गिरना-पड़ना एक सामान्य बात थी।
राजा का क्रोध बढ़ने लगा, "कौन थी वह? सच बताओ!"
समूह में खड़ी सबसे बूढ़ी दासी को यह आभास हो गया कि क्रोध में अंधा राजा सबको दंडित करेगा, और यदि मामला गंभीर हुआ तो वह किसी की जान भी ले सकता है। उसे अभी भी यह नहीं पता था कि राजा के क्रोध का असली कारण क्या है।
राजा ने अपनी तलवार म्यान से बाहर निकाल ली। बूढ़ी दासी ने सबको बचाने के लिए बिना सोचे-समझे अपने कदम आगे बढ़ाए और धीमी आवाज़ में बोली, "माफी हुजूर, मैं..."
राजा ने आव देखा न ताव, एक ही झटके में उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। वह अपनी कुटिल मुस्कान के साथ खून से सनी तलवार देखने लगा और एक विजेता की मुद्रा में दरबार की ओर बढ़ गया।
दृश्य देखकर एक दासी डर के मारे बेहोश हो गई। बाकी दासियाँ सहमी हुई एक-दूसरे से लिपटकर सिसकियाँ भरने लगीं। वही युवा दासी (जिसने राजा को गिरते देखा था) सोचने लगी, "इतनी निर्दयता! क्या महज़ लड़खड़ाकर गिर जाना इतनी बड़ी बात है कि किसी की जान ले ली जाए?"
यही सवाल उसे मथ रहा था। उसे याद आया कि मरने से पहले उस बुढ़िया ने उसका हाथ थामकर उसे चुप रहने का संकेत दिया था। क्या वह बुढ़िया जानती थी कि राजा का अहंकार कितना क्रूर है? क्या उसने अपनी जान देकर उस युवा दासी को बचाया था?
तभी डरी हुई दासियों ने उसे वहाँ से चलने का इशारा किया। इन अनुत्तरित सवालों के साथ वह छोटी रानी के कक्ष की ओर बढ़ी। पीछे दरबार से राजा की बुलंद आवाज़ गूँज रही थी—वह प्रजा की भलाई, सत्य, धर्म और न्याय पर लंबा भाषण दे रहा था।
(इस कहानी के बारे में आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि वह युवा दासी कभी राजा के इस सच को उजागर कर पाएगी? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में साझा करें।)
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