संवेदना
"कभी-कभी सत्य और तर्क हार जाते हैं, और किसी की 'बेवजह-सी संवेदना' जीत जाती है। पढ़िए एक ऐसी ही कविता जो बताती है कि दुनिया केवल तर्क से नहीं, बल्कि एक-दूसरे के प्रति संवेदनशीलता से चलती है।"
एक कुतिया ने
चार–पाँच बच्चों को जन्म दिया।
मेरी पत्नी
उन्हें दुलारती थी—
ऐसे
जैसे वे जवाब दे रहे हों।
मैंने कहा था,
इनमें से
शायद एक ही बचेगा।
वह
हर बार
अचम्भे से देखती—
जैसे यह बात
पहली बार सुनी हो।
मैं
उसे कई बार बता चुका था
कि जानवरों में
जीवित रहने की दर
कम होती है।
वह
यह जानती थी।
फिर भी
हर बार
उन्हें सहलाती रही।
तर्क कहता है—
प्रकृति चुनती है
मज़बूत को।
डार्विन की किताब में
साफ़ लिखा है।
लेकिन
जब वह
उन नन्हों से बात करती है,
तो लगता है—
मनुष्य
शायद
ज्ञान से कम,
संवेदना से ज़्यादा
आगे बढ़ा है।
दिन बीतते हैं।
आँगन
वही रहता है।
कुछ आवाज़ें
धीरे-धीरे
कम हो जाती हैं।
कुतिया
अब भी
उसी कोने में आती है
जहाँ बच्चे थे—
ज़मीन को सूँघती है,
हल्का-सा कुरेदती है,
फिर चुप बैठ जाती है।
मेरी पत्नी
पास जाकर
धीरे से
उसकी पीठ सहलाती है।
वह
फिर भी
उसी जगह बैठती है,
जहाँ वे थे,
हथेली
धीरे से रख देती है—
जैसे
ग़ैर-मौजूदगी भी
छूई जा सकती हो।
मैं
अब तर्क कम देता हूँ।
सत्य
अपनी जगह
ठीक रहता है,
पर दुनिया
कई बार
उससे नहीं,
किसी की
बेवजह-सी
संवेदना से
थोड़ी देर और
टिकी रहती।
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