संदेश

गुड़िया का जनाज़ा

जब दुनिया बड़े-बड़े दावों और जंगों में उलझी होती है, तब एक मासूम कोना चुपचाप दम तोड़ रहा होता है। यह कविता उन नन्हें कंधों और सहमी हुई आँखों की आवाज़ है, जिनसे उनका बचपन, उनके रंग और उनकी मुस्कान वक़्त से पहले ही छीन ली गई। आइए, शब्दों के इस आईने में आज की दुनिया का असली चेहरा देखें।   गुड़िया का जनाज़ा मिट्टी की गलियों में, टूटी दीवारों के बीच, चार नन्हे कंधों पर एक ख़ामोश कहानी है। हँसी के लिबास में छुपा हुआ मातम, ये खेल नहीं — वक़्त की बेइमानी है। गुड़िया है या कोई अधूरा सपना, दुपट्टे में लपेटकर जिसे उठाया गया, न दुआ मिली, न कोई साया मिला, बस मासूमियत को यहाँ दफ़नाया गया। इन नन्ही हथेलियों पर कितना बोझ है, जो उम्र से पहले ही समझदार हो गईं, खिलौनों की दुनिया में जन्मी आँखें, खंडहरों की खामोश गवाह हो गईं। लोरी की जगह धमाकों की गूँज है, हर रात यहाँ दिलों को दहलाती है, जहाँ खिलखिलाहट भी सहमी-सहमी चले, वहाँ नींद भी रोते-रोते आती है। किससे पूछें ये मासूम सवाल — कि खेल में ये मातम क्यों शामिल है? किसने छीना इनसे रंगों का जहाँ, क्यों हर सपना यहाँ ज़ख्मी और घायल है? ये चार कदम जो साथ उठे...

संवेदना

"कभी-कभी सत्य और तर्क हार जाते हैं, और किसी की 'बेवजह-सी संवेदना' जीत जाती है। पढ़िए एक ऐसी ही कविता जो बताती है कि दुनिया केवल तर्क से नहीं, बल्कि एक-दूसरे के प्रति संवेदनशीलता से चलती है।" संवेदना एक कुतिया ने चार–पाँच बच्चों को जन्म दिया। मेरी पत्नी उन्हें दुलारती थी— ऐसे जैसे वे जवाब दे रहे हों। मैंने कहा था, इनमें से शायद एक ही बचेगा। वह हर बार अचम्भे से देखती— जैसे यह बात पहली बार सुनी हो। मैं उसे कई बार बता चुका था कि जानवरों में जीवित रहने की दर कम होती है। वह यह जानती थी। फिर भी हर बार उन्हें सहलाती रही। तर्क कहता है— प्रकृति चुनती है मज़बूत को। डार्विन की किताब में साफ़ लिखा है। लेकिन जब वह उन नन्हों से बात करती है, तो लगता है— मनुष्य शायद ज्ञान से कम, संवेदना से ज़्यादा आगे बढ़ा है। दिन बीतते हैं। आँगन वही रहता है। कुछ आवाज़ें धीरे-धीरे कम हो जाती हैं। कुतिया अब भी उसी कोने में आती है जहाँ बच्चे थे— ज़मीन को सूँघती है, हल्का-सा कुरेदती है, फिर चुप बैठ जाती है। मेरी पत्नी पास जाकर धीरे से उसकी पीठ सहलाती है। वह फिर भी उसी जगह बैठती है, जहाँ वे थे, हथेली धीरे ...

माँ के नाम पत्र

रात के तीन बजे, जब दुनिया सो रही होती है, एक छात्र अपने डर, अकेलेपन और अपनी माँ की यादों से लड़ रहा है। यह पत्र उस संघर्ष की दास्तान है, जो घर से दूर बड़े शहरों के कोचिंग संस्थानों में दम तोड़ देता है। माँ की ममता और सिस्टम की निष्ठुरता के बीच के इस अंतर को बयां करती एक मार्मिक रचना। माँ के नाम पत्र रात के तीन बज गए हैं, माँ, मुझे नींद नहीं आ रही। कल मॉक टेस्ट है— इस सप्ताह तीसरा। तुम्हें पता है, मैं रोज़ाना छह घंटे कोचिंग लेता हूँ, और उसके बाद बारह से चौदह घंटे सेल्फ-स्टडी करता हूँ। ज़्यादातर मॉक टेस्ट में मैं टॉपर रहता हूँ— फिर भी अंदर एक डर लगातार जागता रहता है। पढ़ाई के अलावा, माँ, मुझे तुम्हारी बहुत याद आती है। तुम मुझसे बहुत दूर हो। तीन महीने से मैं तुमसे मिला नहीं हूँ। सप्ताह में पाँच मिनट ही मोबाइल पर तुमसे बात करने की अनुमति मिलती है— और उन पाँच मिनटों में भी मैं देखता हूँ तुम मेरी कितनी चिंता करती हो। मुझे पता है, तुम पिताजी को मुझे भेजने से रोक नहीं पाई होगी। मन ही मन कितना रोती होगी तुम। माँ, जब मैं घर पर था तब भी कितना अच्छा परफ़ॉर्म कर रहा था। हाँ, यहाँ टॉप क्लास अकैडमिक पढ...

अहंकार का साया (हिंदी लघुकथा)

क्या न्याय की कुर्सी पर बैठा हर व्यक्ति वास्तव में न्यायप्रिय होता है? या सत्ता का अहंकार इंसान को इतना खोखला कर देता है कि उसे अपनी एक छोटी सी मानवीय चूक भी किसी बड़े अपराध जैसी लगने लगती है? अहंकार का साया यह एक राजा की कहानी है, या यूँ कहें कि एक कड़वी सच्चाई। एक सुबह राजा सज-धजकर अपने दरबार के लिए महल की सीढ़ियाँ उतर रहा था। अचानक, वह दो-तीन सीढ़ियों से लड़खड़ाकर नीचे गिर पड़ा। वह सकपका गया। उसे तुरंत यह अहसास हुआ कि महल की किसी दासी ने उसे गिरते हुए देख लिया है। उसका अनुमान सही था; एक दासी घबराकर झरोखे के पीछे छिप गई थी। राजा के मन में डर समा गया कि दासी यह बात सबको बता देगी और उसके विरोधी इसे उसकी कमजोरी मानकर सत्ता पाने का अवसर खोजने लगेंगे। उसके भीतर विचारों का बवंडर उठने लगा, "मैं अभी बूढ़ा नहीं हुआ हूँ। क्या राजा कभी बूढ़ा होता है? जब तक वह जीवित है, वही राजा है। क्या उसकी नज़र कमज़ोर हो गई है? नहीं, पिछले महीने ही तो मैंने हिरण का शिकार किया था। दरबार में भी तो मैं हर दरबारी के मन को भांप लेता हूँ। जब फसल पर अतिरिक्त कर लगाने का निर्णय लिया गया, तो सबने सहमति जताई थी, प...

एक तानाशाह के बचपन का फ़ोटो

एक छोटे-से बच्चे की निश्छल मुस्कान और चमकती आँखों में छिपी संभावनाएँ, समय के साथ कैसे बदल जाती हैं—यह रचना उसी परिवर्तन की गहरी पड़ताल करती है। यह केवल एक तस्वीर का वर्णन नहीं, बल्कि मानव स्वभाव, परिस्थितियों और सत्ता के बीच के जटिल संबंधों पर एक विचार है।  एक तानाशाह के बचपन का फ़ोटो एक तानाशाह के बचपन का फ़ोटो मैंने गौर से देखा। एक छोटा-सा बच्चा— दो या तीन साल का रहा होगा। मुस्कान उसके होंठों पर ठहरी हुई थी। उसके सफ़ेद , मोतियों जैसे दाँत चेहरे की सुंदरता में उजास भर रहे थे। आँखें निश्छल और चमकीली थीं— मानो कोई गहरी झील शांत होकर मुझे देख रही हो। घुँघराले बाल मासूमियत की ख़ामोश गवाही दे रहे थे।   दोनों हाथ हवा में अठखेलियाँ कर रहे थे , और नन्हे पैर ज़मीन से भरोसा जोड़े खड़े थे — बालपन की महक बिखेरते हुए। ऐसा लगता था— जैसे उसकी माँ ठीक उसके सामने खड़ी हो।। जिस निडर-सी मुस्कान से वह निहार रहा था सामने , उसकी सच्चाई का सबसे उजला प्रमाण थी वह। और कैमरा-मैन , जिसने बेख़ौफ़ होकर यह पल क़ैद कर लिया , दुनिया के लिए छोड़ गया एक यादगार— एक तानाशाह...

सुनो, तुम एक नया स्वेटर ले लो

यह कविता एक साधारण परिवार के भीतर छिपे प्रेम, त्याग और जिम्मेदारियों की गहराई को व्यक्त करती है। इसमें एक पत्नी के अनकहे अहसास बेहद सादगी से उभरते हैं।   सुनो ,  तुम एक नया स्वेटर ले लो सुनो , तुम एक नया स्वेटर ले लो। पुराना अब तुम पर फबता नहीं , रंग भी उड़ गया है— कुछ ऊन के धागे चुपके से बाहर आ गये हैं।   अब यह मत कहना—मकान की किस्त चुकानी है ; जानती हूँ , बच्ची बड़ी हो रही है। मेरी दवाइयों का महीने का खर्च भी बहुत है , पर मेरी चिन्ता छोड़ो— मैं तो दिन भर घर में रहती हूँ , ठण्डे पानी में काम करती हूँ , चूल्हे पर पकाती हूँ।   और तुम— तुम तो दिन भर भटकते रहते हो , कहीं तुम्हें सर्दी लग गई होगी…   सुनो , तुम एक नया स्वेटर ले लो। मैंने भी तो नये कपड़े पिछले महीने लिये थे , और तुम्हारी लाडली बिटिया—कल ही तो नये जूते लाई है।       अब बहाना मत बनाओ— सर्दी तो दो–तीन महीने की है। यह मत कहना—मुझे सर्दी नहीं लगती है।   मैं सब महसूस करती हूँ— जब भरी सर्दी में तुम घर से बाहर होते हो , तुम कितना ...